Om jai jagdish hare “ॐ जय जगदीश हरे” भगवान विष्णु को समर्पित हिन्दू भक्ति गीत है और इसे ‘आरती’ शैली के भक्तिगीतों का हिस्सा माना जाता है। इस गीत के असली रचयिता का निर्धारण करना कठिन है, क्योंकि यह बहुत सालों से हिन्दू परंपरागत साहित्य का हिस्सा रहा है और इसका सैलाब समृद्धि करता रहा है। पर कुछ उल्लेखो की मने तो पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने सन् 1780 में ओम जय जगदीश हरे, आरती लिखी थी। यह आरती वैसे तो भगवान विष्णु को समर्पित है, लेकिन लगभग हर पूजा पे गाई जाती है । कुछ श्रद्धालुओं का ऐसा भी मानना है कि इस आरती को करने से सभी देवताओं की आरती का पुण्य मिलता है।
आरती’
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥
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Om jai jagdish hare “ॐ जय जगदीश हरे” भक्तों के सुख-शांति की कामना के साथ भगवान विष्णु की कृपा की प्रार्थना करता है। इसे धार्मिक कार्यक्रमों, त्योहारों, और विभिन्न अवसरों पर मुख्य आरती के रूप में गया जाता है । Om jai jagdish hare ॐ जय जगदीश के साथ गुरुवार व्रत कथा और उसके महत्व के बारे में भी जाने




